✍ डॉ. भूपेंद्र गुप्ता
धर्म - कर्म में आस्था, ईश्वर में विश्वास रखना अच्छी बात है, पर जब यह विश्वास अन्धविश्वास का रूप ले ले तब विकट परिस्थितियां खड़ी होने लगती है, विशेषकर जब लोग इलाज झाड-फूंक, बैगा, तांत्रिक आदि से कराने लगते है, इस स्थिति में रोग का समुचित इलाज नहीं हो पाता है साथ ही रोग भी बढ़ते जाता है|
धर्म - कर्म में आस्था, ईश्वर में विश्वास रखना अच्छी बात है, पर जब यह विश्वास अन्धविश्वास का रूप ले ले तब विकट परिस्थितियां खड़ी होने लगती है, विशेषकर जब लोग इलाज झाड-फूंक, बैगा, तांत्रिक आदि से कराने लगते है, इस स्थिति में रोग का समुचित इलाज नहीं हो पाता है साथ ही रोग भी बढ़ते जाता है|

बात तब की है जब मै एक गाँव
के सरकारी अस्पताल में पदस्थ था, गाँव के कई लोग अपनी लाइलाज या गंभीर बीमारी के
लिए झाड-फूंक भी कराते थे| एक दम्पति मेरे
पास आये, वे महिला के सिर दर्द के लिए आये थे, बात करने एवं पुरानी बीमारी के बारे
में पूछने से पता चला कि उस महिला को तीन
बार गर्भ ठहरा था, परन्तु तीन से चार माह में ही गर्भपात हो जाया करता था, अब तक
उन्होंने कोई चिकित्सकीय इलाज नहीं करवाया था, उनके परिवार वाले उस महिला को एक
तांत्रिक/ ओझा के पास ले जाया करते थे, जो किसी पूजा के बहाने महिला के पीठ में एक
थाली चिपका दिया करता था, और कहा करता था कि किसी प्रेत का साया है, जब तक वह नहीं
छोड़ेगा, गर्भ नहीं होगा, इस तरह से उन्हें दो वर्ष हो चुके थे, पूजा के नाम पर
मुर्गा, बकरा, शराब और कुछ हजार रुपये वे दे चुके थे, पर नतीजा कुछ नहीं हुआ, उलटे
महिला को मासिक आना बंद हो गए थे|
मैंने उन्हें समझाया कि यह गर्भाशय की बीमारी अथवा हार्मोनल असंतुलन की
वजह से होता है, उन्हें जांच करने कि आवश्यकता है, इस प्रकार तंत्र मन्त्र में उलझने
से उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला, वे दम्पति माने , जांच हुई, महिला को अंडाशय
में सिस्ट की बीमारी थी, उन्हें समझा बुझाकर 5-6 माह तक इलाज चलाया गया, इलाज के
दौरान परिवार वाले पुनः उसी तंत्रक के पास जाने के लिए दवाब डालते, पर मेरे समझाने
पर इस बार वो अडिग थे| अंततः महिला को गर्भ ठहर गया, उस दम्पति के परिवार वाले भी
खुश थे|
अचानक एक दिन वे दम्पति फिर मेरे पास आये, महिला के गर्भकाल का सातवाँ महिना चल रहा था, महिला को
रक्तस्त्राव शुरू हो चूका था, महिला के पति ने बताया, तांत्रिक ने कहा था कि प्रेत
का साया नहीं हटा है, बच्चा रुक नहीं पायेगा, और इसे रक्त जाने लगा, तो हमें कुछ
सुझा नहीं तो फिर आपके पास आये हैं,
सोनोग्राफी कराइ गई उसे प्लेसेंटा से जुडी परेशानी थी जिसके वजह से रक्तस्त्राव हो रहा था और गर्भस्थ शिशु का विकाश अपेक्षाकृत कम था, मैंने कहा घबराने कि बात नहीं है, पुनःदो माह तक इलाज चला, लगभग 10 माह में सर्जरी के द्वारा उस महिला कि डिलीवरी हुई, उन्हें पुत्र रत्न कि प्राप्ति हुई, अपने पुत्र को लेकर 6 माह बाद वे पुनः क्लीनिक आये और आभार जताया |
सोनोग्राफी कराइ गई उसे प्लेसेंटा से जुडी परेशानी थी जिसके वजह से रक्तस्त्राव हो रहा था और गर्भस्थ शिशु का विकाश अपेक्षाकृत कम था, मैंने कहा घबराने कि बात नहीं है, पुनःदो माह तक इलाज चला, लगभग 10 माह में सर्जरी के द्वारा उस महिला कि डिलीवरी हुई, उन्हें पुत्र रत्न कि प्राप्ति हुई, अपने पुत्र को लेकर 6 माह बाद वे पुनः क्लीनिक आये और आभार जताया |
जब परिवार के अन्य सदस्य अथवा आसपास के अन्य लोग किसी के अंधभक्ति या
किस अन्धविश्वास का शिकार होते हैं, तो वे अपने से जुड़े लोगों को भी प्रभावित करने
लगते हैं, उन्हें भी अपने साथ चलने का दवाब डालते हैं, अक्सर लोग इसी दवाब के चलते
तांत्रिक, झाड-फूंक करने वालों के संपर्क में आते हैं, अक्सर आप तांत्रिकों के ठिकानों
में लोगो की भीड़ अवश्य पायेंगे| यह भीड़ इसी अन्धविश्वास का नतीजा है | अन्धविश्वास
की वजह से कई अमानवीय कृत्य, अत्याचार, शर्मनाक घटनाये होती रहती हैं, जो किसी भी
तरह से उचित नहीं है |
एक मरीज ने मुझसे प्रश्न किया कि , ऐसा क्यों होता है कि जब किसी
तांत्रिक के पास जाते हैं तो अचानक से पूरी तकलीफ दूर हो जाती है, परन्तु दो चार
दिन बाद फिर वही तकलीफ शुरू हो जाती है | सवाल बहुत सही है, ऐसा कई लोगों को
प्रतीत होता होगा| दरअसल यह सब हमारे विचारों एवं उम्मीदों के वजह से होता है, जब
कोई आपसे अच्छे तरीके से आपकी तकलीफ के बारें में सुनता है, अच्छी बातें करता है,
उम्मीद देता है तो लगने लगता है कि आधा दर्द तो इनसे बात करके ही चला गया| फिर तांत्रिकों
द्वारा कई कौतुहल जनक क्रियाएं की जाती है, जो लोगों के लिए नयी और आश्चर्यजनक होती
है, ऊँची आवाज़, अस्पुष्ट भाषा, उच्च स्तर की सकारात्मक बाते आदि सम्मोहित करने का
कार्य करती है, तो मस्तिष्क को ऐसा अभाष होने लगता है कि वह ठीक हो रहा है, बस यही
है जो मुझे ठीक कर सकता है, जबकि यह क्षणिक अहसास होता है, एवं तकलीफ़ कुछ दिन बाद पुनः
शुरू हो जाती है|
अक्सर लोग अन्धविश्वास के
कारण रोगों के इलाज के लिए अनुचित और गैर चिकित्सीय कार्य में लिप्त हो जाते हैं,
मंशा तो यही रहती है कि सब कुछ ठीक हो जायेगा पर अक्सर स्थिति बिगड़ ही जाती है|
तंत्र मन्त्र, झाड फूंक के नाम पर रोजी रोटी कमाने वाले आम लोगों की इसी मानसिक
दुर्बलता का फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते है |शिक्षा के प्रसार
से अन्धविश्वास में कमी तो आई है, परन्तु अब भी लोग इसे दैवीय कोप, प्रेत साया
इत्यादि मानकर अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं|
कभी कोई भी शारीरिक,
मानसिक परेशानी आये तो अन्धविश्वास में पड़कर बैगा या ओझा के पास जाने के स्थान पर
चिकित्सक, मनोरोग सलाहकार या किसी योग्य व्यक्ति के पास सलाह के लिए जाएँ, आपकी
समस्या का निराकरण अवश्य होगा | इस विषय में सलाह , मार्गदर्शन हेतु हमें लिखे अथवा संपर्क करें - हमारे मेल एड्रेस में लिखे - ई-मेल
No comments:
Post a Comment